Monday, 26 January 2015

साण्डी पक्षी अभयारण्य

साण्डी पक्षी अभयारण्य

हरदोई नगर की जलवायु एवं भौगोलिक विविधता के कारण जिले में भरपूर पक्षी वैविध्य है , शीतकाल में स्थानीय तथा प्रवासी पक्षियों के झुण्ड साण्डी नगर की झील का मुख्य आकर्षण है। पारिस्थितिक संतुलन बनाये रखने में पक्षियों का महत्वपूर्ण योगदान है , हमारे देश में पक्षियों की लगभग 1250 प्रजातियां पाई जाती हैं, इनमे से लगभग 300 प्रजातियों के पक्षी तिब्बत ,चीन ,यूरोप तथा साइबेरिया से हिमालय पर्वत पार कर हमारे देश में शीतकालीन प्रवास हेतु आते हैं। इनमे कुछ पक्षी तो 5000 किलोमीटर से भी अधिक दूरी से तथा 8500 मीटर तक की ऊंचाई तक उड़कर हमारे हरदोई जिले में आते है।



साण्डी पक्षी अभयारण्य उत्तर प्रदेश प्रदेश के हरदोई में स्थित है। साण्डी पक्षी अभयारण्य की स्थापना 1990 ई. में हुई थी। यह अभयारण्य लखनऊ से लगभग 150 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यह अभयारण्य लगभग तीन किलोमीटर के क्षेत्र में फैला हुआ है।

यहां पक्षियों की अनेक प्रजातियां देखी जा सकती है। यहां घूमने के लिए सबसे उचित समय दिसम्बर से फरवरी है।


वाच टॉवर

विश्व में पक्षियों की लगभग 10000 दस हजार प्रजातियां हैं। उनमें से लगभग 1300 प्रजातियां भारत में पायी जाती हैं और उसमें से उत्तर प्रदेश में 550 प्रजातियां पायी जाती हैं। इनमें से कुछ प्रजातियां केवल सर्दियों के मौसम में ही दिखलायी पडती हैं। वे सामान्यतः प्रवासी पक्षी हैं- जैसे पर्पल सनबर्ड जो उत्तर प्रदेश के हृदय स्थल में स्थित हरदोई जनपद के पश्चिमी भाग में स्थित साण्डी पक्षी विहार में दिसम्बर के दूसरे सप्ताह के आसपास दिखलाई पडता है।
उत्तर प्रदेश में गंगा के मैदानी भाग के पारिस्थितिक तंत्र के संरक्षण हेतु 12 पक्षी बिहारों की स्थापना की गई है।
यह पक्षी बिहार प्रदेश के हृदयस्थ  भू-भाग में  स्थित जनपद हरदोई में , हरदोई शहर के निकट हरदोई सांडी मार्ग के किनारे स्थित प्राचीन "दहर झील" के नाम से विख्यात 308.5432 हेक्टर क्षेत्र में  स्थित है।
पक्षी बिहार के पास ही गर्रा नदी बहती है  जिसका प्राचीन नाम गरुण गंगा है, पक्षी बिहार में आने वाली प्रवासी पक्षी कुछ समय के लिए इसमे भी विश्राम करते हैं। 

  
शीतकाल के प्रारंभ होते ही नवंबर महीने से प्रवासी पक्षियो का आवागमन प्रारंभ हो जाता है। जनवरी फरवरी महीने मे यह पक्षी बिहार अपने चरम सौंदर्य पर रहता है। पक्षियों के कोलाहल किल्लोल आदि से एक मनमोहक नजारा देखने को मिलता है।
 
 
 
 
ग्रीष्मकाल के आगमन पर  मार्च महीने तक यह प्रवासी अतिथि शनै: शनै: पुनरागमन के लिए वापस अपने अपने देश लौट जाते हैं ।
  


अधिक जानकारी के लिए वेबसाइट : http://sandisanctuary.com
साण्डी पक्षी अभयारण्य

साण्डी पक्षी अभयारण्य


हरदोई नगर की जलवायु एवं भौगोलिक विविधता के कारण जिले में भरपूर पक्षी वैविध्य है , शीतकाल में स्थानीय तथा प्रवासी पक्षियों के झुण्ड साण्डी नगर की झील का मुख्य आकर्षण है। पारिस्थितिक संतुलन बनाये रखने में पक्षियों का महत्वपूर्ण योगदान है , हमारे देश में पक्षियों की लगभग 1250 प्रजातियां पाई जाती हैं, इनमे से लगभग 300 प्रजातियों के पक्षी तिब्बत ,चीन ,यूरोप तथा साइबेरिया से हिमालय पर्वत पार कर हमारे देश में शीतकालीन प्रवास हेतु आते हैं। इनमे कुछ पक्षी तो 5000 किलोमीटर से भी अधिक दूरी से तथा 8500 मीटर तक की ऊंचाई तक उड़कर हमारे हरदोई जिले में आते है। 

चित्र:Sandee.JPG 
साण्डी पक्षी अभयारण्य उत्तर प्रदेश प्रदेश के हरदोई में स्थित है। साण्डी पक्षी अभयारण्य की स्थापना 1990 ई. में हुई थी।

यह अभयारण्य लखनऊ से लगभग 150 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यह अभयारण्य लगभग तीन किलोमीटर के क्षेत्र में फैला हुआ है।

यहां पक्षियों की अनेक प्रजातियां देखी जा सकती है। यहां घूमने के लिए सबसे उचित समय दिसम्बर से फरवरी है।

विश्व में पक्षियों की लगभग 10000 दस हजार प्रजातियां हैं। उनमें से लगभग 1300 प्रजातियां भारत में पायी जाती हैं और उसमें से उत्तर प्रदेश में 550 प्रजातियां पायी जाती हैं। इनमें से कुछ प्रजातियां केवल सर्दियों के मौसम में ही दिखलायी पडती हैं।
वे सामान्यतः प्रवासी पक्षी हैं- जैसे पर्पल सनबर्ड जो उत्तर प्रदेश के हृदय स्थल में स्थित हरदोई जनपद के पश्चिमी भाग में स्थित साण्डी पक्षी विहार में दिसम्बर के दूसरे सप्ताह के आसपास दिखलाई पडता है।




Sunday, 18 January 2015

Hardoi Mahotsav

Hardoi Mahotsav

About Hardoi Mahotsav

On account of 168th Anniversary of Hardoi, with inspiration of state government and support of Hardoi administration is going to celebrate it in the splendid way through Hardoi Mahotsav from 13th January-22nd January 2015. In this grand event the various handicrafts, craftsmen will present their artworks. Besides them, Bollywood celebs will present their grand performances . On this occasion in the motive to promote Hardoi’s Art, Culture and Tourism for national and international tourists, the decision to organize the Hardoi Festival was taken. During this period with exception to a few years Hardoi Mahotsava has been organized this year.

To give the Exhibition a grand outlook all the stalls will have similar facials. The other major attractions would be the replica of the Victoria Tower, the exhibit from different public attraction place across the state and theme pavilion. Hardoi’s Art and Culture is also portrayed through mannequins which have been displayed at various places at the Mahotsava premises. On this event of Hardoi Mahotsava other attractions like Youth Festival,Kids Festival, Kite Competition,Wrestling,Pyrotechnics, Drama Competition are being organized for public interest. Participation is invited from various age groups in these events.This year’s Hardoi Mahotsav will have Wrestling and Brass band competition are all set to debut in the annual event. It Duty for cleanliness and the parking arrangements is been done by Nagar Nigam

This year Famous artistes like Vinod Rathor ,Abhijeet Sawant ,Sapna Avasthi ,Urja Dance Group , Tanmya Pratiksha would gracing the Mahotsav. Mahotsava provides an opportunity to hundreds of awarded artisans from more than 20 states of India to display their exquisite handicrafts.

Events:

Hardoi Mahotsav Main Event

Hardoi Mahotsav Main Event
Hardoi Mahotsav Main Event
ब्रिटिश हुकूमत में बना था आरआर कालेज

ब्रिटिश हुकूमत में बना था आरआर कालेज

राजा रुक्मांगद सिंह इण्टर कॉलेज हरदोई
हरदोई जिले में शिक्षा की अलख जगाने को ब्रिटिश हुकूमत में कटियारी नरेश राजा रुकमांगद सिंह ने जमीन खरीदकर जिस कालेज की स्थापना की थी, उसके 100 साल पूरे हो गए। आज भी इस कालेज की इमारत अपनी अनोखी छटा बिखेर रही है। कालेज से पढ़कर निकले छात्रों ने सूबे में ही नहीं देश में नाम रोशन किया है। पुरानी यादों को ताजा करते हुए कालेज का स्वर्ण शताब्दी समारोह का आगाज आज से शुरू हो रहा है।
कटियारी नरेश का सपना था कि जिले के नौनिहाल पढ़कर लिखकर देश विदेश में यहां का नाम रोशन करें। इसी मंशा से उन्होंने नघेटा रोड पर जमीन खरीदकर एक स्कूल बनाने का निर्णय लिया। ब्रिटिश हुकू मत में इस स्कूल को खोलने मेें काफी अड़चनें भी आईं, पर ठाकुर मशाल सिंह के सहयोग से उन्होंने इन बाधाओं को पार कर वर्ष 1914 में स्कूल की स्थापना कर इसकी जिम्मेदारी ठाकुर मशाल सिंह को सौंपी। उन्होंने कालेज की भव्य इमारत तैयार कर उसमें कक्षाओं का संचालन शुरू करवाया। इंटरमीडिएट का दर्जा दिलाने में ठाकुर सुरेंद्र विक्रम सिंह ने अहम भूमिका निभाते हुए कक्षाओं का संचालन कराया। स्कूल पहले प्रधानाध्यापक के रूप में अयोध्या सिंह राठौर की नियुक्ति की गई।
       तत्कालीन प्रबंधक और प्रधानाध्यापक के प्रयासों से अंग्रेजी हुकू मत ने वर्ष 1922 में हाईस्कूल कक्षाओं की मान्यता दे दी। इसके बाद वर्ष 1935 में ठाकुर मशाल सिंह निधन हुआ और प्रबंध तंत्र की जिम्मेदारी ठाकुर सुरेंद्र विक्रम सिंह के कंधों पर आ गई। उन्होंने इस स्कूल को और आगे बढ़ाने का प्रयास किया। वर्ष 1942 में जहां एक ओर आजादी की लड़ाई चल रही थी, वहीं प्रबंध तंत्र ने इस स्कूल को इंटरमीडिएट का तोहफा दिया। इस दौरान जो भी प्रबंधक रहा उसने कालेज के विकास को गति प्रदान की। आजादी के बाद वर्ष 1948 में तत्कालीन प्रधानाचार्य राजवंत सिंह के अनुरोध पर तत्कालीन प्रबंधक ने इंटरमीडिएट में विज्ञान, कृषि व वाणिज्य विषय के अध्ययन की व्यवस्था की।
कृषि अध्ययन मेेें छात्रों को उत्साह न होने से कृषि की कक्षाएं बंद हो गई। वर्तमान मेें कालेज प्रबंधक कीर्ति सिंह और प्रधानाचार्य वीरेंद्र सिंह राठौर के निर्देशन में स्कूल स्वर्ण शताब्दी समारोह का आयोजन कर रहा है। फिलहाल समारोह में उन पूर्व छात्रोें को भी आमंत्रित किया गया है, जो जनपद का नाम रोशन कर रहे है। उधर, सपा के राष्ट्रीय महासचिव डा. अशोक बाजपेयी समेत कई प्रमुख लोगों ने इस विद्यालय से शिक्षा ग्रहण की। कालेज प्रबंधक कीर्ति सिंह ने बताया कि बाजपेयी के अलावा जनरल मैनेजर एसबीआई सत्येंद्र विक्रम सिंह, ग्रुप कैप्टन रविंद्र कुमार समेत कई आईएएस व आईपीएस इसी विद्यालय में पढ़कर आगे निकले हैं।

ब्रिटिश हुकूमत में बना था आरआर कालेज

ब्रिटिश हुकूमत में बना था आरआर कालेज


हरदोई जिले में शिक्षा की अलख जगाने को ब्रिटिश हुकूमत में कटियारी नरेश राजा रुकमांगद सिंह ने जमीन खरीदकर जिस कालेज की स्थापना की थी, उसके 100 साल पूरे हो गए। आज भी इस कालेज की इमारत अपनी अनोखी छटा बिखेर रही है। कालेज से पढ़कर निकले छात्रों ने सूबे में ही नहीं देश में नाम रोशन किया है। पुरानी यादों को ताजा करते हुए कालेज का स्वर्ण शताब्दी समारोह का आगाज आज से शुरू हो रहा है।
कटियारी नरेश का सपना था कि जिले के नौनिहाल पढ़कर लिखकर देश विदेश में यहां का नाम रोशन करें। इसी मंशा से उन्होंने नघेटा रोड पर जमीन खरीदकर एक स्कूल बनाने का निर्णय लिया। ब्रिटिश हुकू मत में इस स्कूल को खोलने मेें काफी अड़चनें भी आईं, पर ठाकुर मशाल सिंह के सहयोग से उन्होंने इन बाधाओं को पार कर वर्ष 1914 में स्कूल की स्थापना कर इसकी जिम्मेदारी ठाकुर मशाल सिंह को सौंपी। उन्होंने कालेज की भव्य इमारत तैयार कर उसमें कक्षाओं का संचालन शुरू करवाया। इंटरमीडिएट का दर्जा दिलाने में ठाकुर सुरेंद्र विक्रम सिंह ने अहम भूमिका निभाते हुए कक्षाओं का संचालन कराया। स्कूल पहले प्रधानाध्यापक के रूप में अयोध्या सिंह राठौर की नियुक्ति की गई।
तत्कालीन प्रबंधक और प्रधानाध्यापक के प्रयासों से अंग्रेजी हुकू मत ने वर्ष 1922 में हाईस्कूल कक्षाओं की मान्यता दे दी। इसके बाद वर्ष 1935 में ठाकुर मशाल सिंह निधन हुआ और प्रबंध तंत्र की जिम्मेदारी ठाकुर सुरेंद्र विक्रम सिंह के कंधों पर आ गई। उन्होंने इस स्कूल को और आगे बढ़ाने का प्रयास किया। वर्ष 1942 में जहां एक ओर आजादी की लड़ाई चल रही थी, वहीं प्रबंध तंत्र ने इस स्कूल को इंटरमीडिएट का तोहफा दिया। इस दौरान जो भी प्रबंधक रहा उसने कालेज के विकास को गति प्रदान की। आजादी के बाद वर्ष 1948 में तत्कालीन प्रधानाचार्य राजवंत सिंह के अनुरोध पर तत्कालीन प्रबंधक ने इंटरमीडिएट में विज्ञान, कृषि व वाणिज्य विषय के अध्ययन की व्यवस्था की।
कृषि अध्ययन मेेें छात्रों को उत्साह न होने से कृषि की कक्षाएं बंद हो गई। वर्तमान मेें कालेज प्रबंधक कीर्ति सिंह और प्रधानाचार्य वीरेंद्र सिंह राठौर के निर्देशन में स्कूल स्वर्ण शताब्दी समारोह का आयोजन कर रहा है। फिलहाल समारोह में उन पूर्व छात्रोें को भी आमंत्रित किया गया है, जो जनपद का नाम रोशन कर रहे है। उधर, सपा के राष्ट्रीय महासचिव डा. अशोक बाजपेयी समेत कई प्रमुख लोगों ने इस विद्यालय से शिक्षा ग्रहण की। कालेज प्रबंधक कीर्ति सिंह ने बताया कि बाजपेयी के अलावा जनरल मैनेजर एसबीआई सत्येंद्र विक्रम सिंह, ग्रुप कैप्टन रविंद्र कुमार समेत कई आईएएस व आईपीएस इसी विद्यालय में पढ़कर आगे निकले हैं।

Monday, 12 January 2015

श्रवण देवी मंदिर

श्रवण देवी मंदिर


श्रवण देवी मंदिर उत्तर प्रदेश में हरदोई जनपद के मुख्यालय में स्थित है। इस मंदिर को देवी के शक्तिपीठों में से एक माना जाता है।

मान्यता 

इस स्थान पर माता सती के कर्ण भाग का निपात हुआ था, इसीलिए मंदिर का नाम श्रवण देवी मंदिर पड़ा।
प्राचीन मूर्ति माता श्रवण देवी

लोककथा

लोककथा है कि दक्ष प्रजापति के यज्ञ मे भगवान शिव के अपमान को सहन न कर पाने पर माता सती ने यज्ञ की अग्नि में ही भस्म होकर अपने प्राण त्याग दिये। सती के पार्थिव शरीर को अपने कन्धे पर लेकर भगवान शिव निकल पड़े और करुण क्रन्दन करते हुए सारे जगत में भ्रमण करने लगे। इस समय समस्त सृष्टि के नष्ट हो जाने का भय देवताओं को सताने लगा। देवता ब्रह्मा और विष्णु की शरण में गये। तब भगवान विष्णु ने अपने चक्र के प्रहार से सती के शरीर के कई टुकड़े कर दिये। जहाँ-जहाँ सती के अंग के टुकड़े, धारण किए हुए वस्त्र या आभूषण आदि गिरे, वहाँ-वहाँ शक्तिपीठ अस्तित्व में आये। ये अत्यंत पावन तीर्थ स्थान कहलाये।
माता श्रवण देवी मंदिर

ये तीर्थ पूरे भारतीय उपमहाद्वीप पर फैले हुए हैं। उस समय माता सती का कर्ण भाग यहाँ पर गिरा था, इसी से इस स्थान का नाम 'श्रवण दामिनी देवी' पड़ा। उत्तर प्रदेश के वाराणसी में विश्वेश्वर के निकट मीरघाट पर माता सती की 'कर्णमणि' गिरी थी। यहाँ 'विशालाक्षी शक्तिपीठ' है।
मुख्य द्वार श्रवण देवी मंदिर

  ऐतिहासिक तथ्य

देवी भागवत में 108 शक्तिपीठों का ज़िक्र मिलता है। इसमें से 'श्रवण देवी मंदिर' भी एक है।
यज्ञ शाला का द्रश्य


उपदेश भवन

यहाँ की जनश्रुति के अनुसार यहाँ पीपल का प्राचीन पेड़ था, जिसकी खोह मे श्रवण देवी की प्राचीन मूर्ति प्राप्त हुई थी। ऐसा कहा जाता है की उस पीपल में स्वयं आकृति बनती और बिगड़ा करती थी। 
1880 ई. में पूर्व खजांची सेठ समलिया प्रसाद को स्वप्न में माँ का दर्शन होने पर उन्होंने इसका विकास करवाया था। इस स्थान पर प्रतिवर्ष क्वार व चैत्र मास (नवरात्र) में तथा आषाढ़ मास की पूर्णिमा में मेला लगता है।



मुख्य पुजारी : श्री रामविलास तिवारी

प्रतिदिन आरती का समय : ४ बजे सुबहः

सायंकालीन आरती का समय : शाम 5 बजकर 15 मिनट

माता का प्रसाद : माता को पंच मेवा का भोग लगाया जाता है 

(केवल शीतकाल में )

श्रंगार आरती : सुबहः 8 बजकर 30 मिनट



विशेष : 
  • शारदीय नवरात्र में एकादशी से पूर्णिमा तक महाशतचण्डी यज्ञ का आयोजन किया जाता है।
  • अगहन महीने की कृष्ण पक्ष की पंचमी से शुक्ल पक्ष की छठ तक अन्नपूर्णा माता का व्रत किया जाता है जो की 17 दिनों तक चलता है। तत्पश्चात अगहन की छठ को विशाल भंडारा का आयोजन होता है। 

Friday, 9 January 2015