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Tuesday, 3 February 2015

हरदोई बाबा मंदिर

हरदोई बाबा मंदिर


हरदोई बाबा मंदिर प्राचीन स्थान है। यह ऐतिहासिक मंदिर प्रहलाद घाट से थोड़ी दूर स्थित है। जिसका निर्माण सन् 1949 के लगभग करवाया गया इसके प्रांगण में एक पीपल का पेड़ है जिसे ' हरदोई बाबा का दरबार ' के नाम से जाना जाता है।
 
हरदोई बाबा मंदिर
यहाँ पर अनेक देवताओ की मूर्तिया स्थापित है मंदिर के सामने स्थित भवन 'कीर्तन भवन' के नाम से जाना जाता है। इसकी दीवारों पर भगवान राम, कृष्ण,राजा हरिशचन्द्र तथा श्रवण कुमार के जीवन से सम्बन्धित चित्र बने है चैत्र मॉस में रामनवमी नवमी,दशमी एकादशी का मेला लगता है।तथा राम लीला होती है। 

मुख्य द्वार श्री हरदोई बाबा मंदिर
हरदोई बाबा का दरबार
प्रत्येक सोमवार व शुक्रवार को विशेष पूजा अर्चना की जाती है। जिनमे सैकड़ो की संख्या में श्रद्धालु भाग लेते है। 

ऐसी मान्यता है की किसी भी परेशानी या बाधा होने पर बाबा जी की विभूति लगाने से समस्या का निराकरण हो जाता है।मनोकामना पूर्ण होने पर श्रद्धालु चाँदी के सिक्के तथा घंटा चढाते है।


कीर्तन भवन

Monday, 12 January 2015

श्रवण देवी मंदिर

श्रवण देवी मंदिर


श्रवण देवी मंदिर उत्तर प्रदेश में हरदोई जनपद के मुख्यालय में स्थित है। इस मंदिर को देवी के शक्तिपीठों में से एक माना जाता है।

मान्यता 

इस स्थान पर माता सती के कर्ण भाग का निपात हुआ था, इसीलिए मंदिर का नाम श्रवण देवी मंदिर पड़ा।
प्राचीन मूर्ति माता श्रवण देवी

लोककथा

लोककथा है कि दक्ष प्रजापति के यज्ञ मे भगवान शिव के अपमान को सहन न कर पाने पर माता सती ने यज्ञ की अग्नि में ही भस्म होकर अपने प्राण त्याग दिये। सती के पार्थिव शरीर को अपने कन्धे पर लेकर भगवान शिव निकल पड़े और करुण क्रन्दन करते हुए सारे जगत में भ्रमण करने लगे। इस समय समस्त सृष्टि के नष्ट हो जाने का भय देवताओं को सताने लगा। देवता ब्रह्मा और विष्णु की शरण में गये। तब भगवान विष्णु ने अपने चक्र के प्रहार से सती के शरीर के कई टुकड़े कर दिये। जहाँ-जहाँ सती के अंग के टुकड़े, धारण किए हुए वस्त्र या आभूषण आदि गिरे, वहाँ-वहाँ शक्तिपीठ अस्तित्व में आये। ये अत्यंत पावन तीर्थ स्थान कहलाये।
माता श्रवण देवी मंदिर

ये तीर्थ पूरे भारतीय उपमहाद्वीप पर फैले हुए हैं। उस समय माता सती का कर्ण भाग यहाँ पर गिरा था, इसी से इस स्थान का नाम 'श्रवण दामिनी देवी' पड़ा। उत्तर प्रदेश के वाराणसी में विश्वेश्वर के निकट मीरघाट पर माता सती की 'कर्णमणि' गिरी थी। यहाँ 'विशालाक्षी शक्तिपीठ' है।
मुख्य द्वार श्रवण देवी मंदिर

  ऐतिहासिक तथ्य

देवी भागवत में 108 शक्तिपीठों का ज़िक्र मिलता है। इसमें से 'श्रवण देवी मंदिर' भी एक है।
यज्ञ शाला का द्रश्य


उपदेश भवन

यहाँ की जनश्रुति के अनुसार यहाँ पीपल का प्राचीन पेड़ था, जिसकी खोह मे श्रवण देवी की प्राचीन मूर्ति प्राप्त हुई थी। ऐसा कहा जाता है की उस पीपल में स्वयं आकृति बनती और बिगड़ा करती थी। 
1880 ई. में पूर्व खजांची सेठ समलिया प्रसाद को स्वप्न में माँ का दर्शन होने पर उन्होंने इसका विकास करवाया था। इस स्थान पर प्रतिवर्ष क्वार व चैत्र मास (नवरात्र) में तथा आषाढ़ मास की पूर्णिमा में मेला लगता है।



मुख्य पुजारी : श्री रामविलास तिवारी

प्रतिदिन आरती का समय : ४ बजे सुबहः

सायंकालीन आरती का समय : शाम 5 बजकर 15 मिनट

माता का प्रसाद : माता को पंच मेवा का भोग लगाया जाता है 

(केवल शीतकाल में )

श्रंगार आरती : सुबहः 8 बजकर 30 मिनट



विशेष : 
  • शारदीय नवरात्र में एकादशी से पूर्णिमा तक महाशतचण्डी यज्ञ का आयोजन किया जाता है।
  • अगहन महीने की कृष्ण पक्ष की पंचमी से शुक्ल पक्ष की छठ तक अन्नपूर्णा माता का व्रत किया जाता है जो की 17 दिनों तक चलता है। तत्पश्चात अगहन की छठ को विशाल भंडारा का आयोजन होता है। 

Tuesday, 30 December 2014

सकाहा मंदिर

सकाहा मंदिर

सकाहा  शंकर मंदिर उत्तर प्रदेश के हरदोई जनपद मुख्यालय से लगभग पच्चीस तीस किलोमीटर दूर सकाहा नामक स्थान में स्थित है।

  • जिसका पुराना नाम सोनिकपुर था तथा यहां पर शंकासुर नामक दैत्य रहा करता था जो हरदोई के शासक हिरण्यकशिपु का सहयोगी था। 
चित्र:Sakaha.jpg
  • भक्त प्रह्लाद के आह्वान पर जब भगवान ने नरसिंह रूप धारण कर हिरण्यकशिपु का वध किया तो शंकासुर भी ने भी यह स्थान छोड दिया। इस स्थान पर शिवलिंगों की एक पिरामिड जैसी आकृति उभर आयी जिस पर भगवान शंकर का मंदिर स्थापित हुआ।

  • यह एक प्राचीन मंदिर था जिसका जीर्णोधार लगभग सत्तर वर्ष पूर्व इस क्षेत्र में तैनात रहे कोतवाल द्वारा कराया गया था।
  • इसके संबंध में यह भी किंवदंती है कि आजादी से कई वर्ष पूर्व लाला लाहौरीमल नामक एक व्यापारी के पुत्र को फांसी की सजा हुयी थी जिसकी माफी के लिये लाला लाहौरीमल ने यहां दरकार लगायी थी और मनौती पूरी होने के पश्चात उनके द्वारा यहां पर शंकर जी का मंदिर बनवाया गया।
  • कालान्तर में यहां पर आवासीय संस्कृत महाविद्यालय की स्थापना हुयी जो आज भी सुचारू रूप से गतिमान है। वर्तमान में इस मंदिर की व्यवस्था आदि का काम स्थानीय महंत श्री उदयप्रताप गिरि द्वारा देखा जा रहा है।

Saturday, 27 December 2014

हत्याहरण तीर्थ

हत्याहरण तीर्थ

हत्याहरण तीर्थ उत्तर प्रदेश प्रदेश के हरदोई जनपद की संडीला तहसील में पवित्र नैमिषारण्य परिक्रमा क्षेत्र में स्थित है।
  • यह तीर्थ लखनऊ से लगभग 150 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।
  • प्रसिद्ध हत्याहारण कुंड तीर्थ के संबंध में यह मान्यता है कि भगवान राम भी रावण वध के उपरांत ब्रह्म हत्या के दोष से मुक्त होने के लिये इस सरोवर में स्नान करने आये थे।
  • इस तीर्थ पर घाट का निर्माण 28 मई 1939 को श्रीमती जनक किशोरी देवी पत्नी स्वर्गीय ठाकुर जनन्नाथ सिंह जी सुपुत्र ठाकुर शंकर सिंह रईस की याद में कराया गया था। श्री जगन्नाथ सिंह जी काकूपूर के जमींदार थे।
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चित्र:Hatyaharan.jpg

ऐतिहासिक कथा

इस तीर्थ की नीव देवो में देव महादेव ने डाली थी!शिव पुराण में वर्णन है!कि माता पार्वती के साथ भगवान भोले नाथ एकांत अर्रान्य(जंगल)कि खोज में निकले और नैमिषारण्य क्षेत्र में विहार करते हुए एक जंगल में जा पहुचे !वहा पर सुरम्य जंगल मिलने पर वहा तपस्या करने लगे ! तपस्या करते हुए माता पार्वती को प्यास लगी जंगल में कही जल ना मिलने पर उन्होंने देवताओ से पानी के लिए कहा तब भगवान सूर्य ने एक कमंडल जल दिया ! जल पान करने के बाद बचे जल को जमीन पर गिरा दिया !तेजस्वी पवित्र जल से वहा पर एक कुण्ड का निर्माण हुआ !जाते वक्त भगवान शंकर ने इस स्थान का नाम प्रभास्कर छेत्र रखा !यह कहानी सतयुग की है!काल बीतते रहे !द्वापर में ब्रम्हा द्वारा अपनी पुत्री पर कुद्रस्ती डालने पर पाप लगा !उन्होंने इस तीर्थ में आकर स्नान किया तब वह पाप मुक्त हुए !तब इस तीर्थ का नाम ब्रम्ह छेत्र पड़ा !त्रेता में मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने रावण का बध किया!तो भगवान राम के हाथ में बiल जम आया !ब्रम्हहत्या लगी!तब गुरु के कहने पर भगवान राम ब्रम्ह हत्या के पाप से मुक्त होने के लिए !इस तीर्थ पर आये और स्नान कर पाप धुले !तब जाकर ब्रम्ह हत्या के पाप से मुक्त हुए!तब त्रेता से आज तक इस स्थान का नाम हत्या हरण पड़ा!तब भगवान राम ने कहा था!जो इस स्थान पर आकर स्नान करेगा वह पाप मुक्त हो जायेगा!हत्या मुक्त हो जायेगा!यहाँ पर राम का एक बार नाम लेने से हजार नामो का लाभ मिलेगा!तब से आज तक लोग यहाँ इस पावन तीर्थ पर आकर हत्या गौ हत्या अन्य तरीके के पापो से मुक्ति पा रहे है!यह स्थान नैमिसरान्य के परिक्रमा स्थल के बीच में भी पड़ता है!यहाँ परिक्रमा स्थल के बीच में अट्ठासी हजार ऋषियों ने तपस्या की थी!इसलिए धार्मिक द्रस्ती से और भी महत्व पूर्ण है!इसके आलावा पांडव भी अपने कुल का नाश करने के बाद यहाँ पर पाप धुलने के लिए यहाँ आये थे!यह एक बिशाल पाताल तोड़ कुण्ड है!जिसके चारो तरफ मंदिर बने है!यहाँ पाप से मुक्ति पाने के लिए दूर से लोग आते है!ऐसा स्थान पृथ्वी पर और कही नहीं !